भारतीय फिल्म इतिहास में एक्शन , थ्रिलर फिल्मों की परंपरा बहुत पुरानी है जो संभवतः नवकेतन की फिल्म “बाज़ी “से प्रारम्भ होती है।इसके बाद इसी  कड़ी में सस्पेंस फिल्मों का भी आगमन हो गया जिसमें “बीस साल बाद “व ” गुमनाम”जैसी फिल्में अत्यधिक लोकप्रिय हुईं। लेकिन इस शैली कीफिल्मों में जो नाम सबसे ऊपर लिया जाता है वह है नवकेतन की फिल्म ‘ज्वेल थीफ “|यह फिल्म अल्फ्रेड हिचकॉक के किसी सस्पेंस जासूसी उपन्यास  की तरह एकदूसरी दुनिया में ही ले जाती  है। दर्शक फिल्म की कहानी की उलझनों में उलझा  हुआ मह्शूश करता है और फिल्म के अंत में एक आश्चर्यजनक प्रसन्नता के साथब|हर निकलता है।

फिल्म का नायक विनय पुलिस कमिश्नर का बेटा है जिसे जवाहरातों में दिलचस्पी व महारत  है और इसी महारत के दम पर वह शहर के सबसेबड़े जोहरी सेठ विशवंभर दास के यहां नौकरी करने लगता है। तभी फिल्म  कहानी में कुछ ऐसे  पात्र आते है जो उसको अमर के नाम से पहचानते हैं।इन्ही में एकफिल्म की नायिका शालिनी है जो विनय से यह कहती है की वह उसकी यानी की अमर की मंगेतर है। यह दुबिधा तो दूर हो जाती है पर  यह स्थापित होने लगता हैकी शहर में हुई जवाहरातों की चोरी के पीछे प्रिंस अमर का हाथ है जिसकी शक्ल हूबहू विनय से मिलती है। विनय पुलिस के साथ मिलकर इस प्रिंस अमर की गुत्थीको सुलझाने का प्रयास करता है। इसी क्रम में कहानी आगे बढ़ती है और अंत में यह प्रकट होता है की प्रिंस अमर नाम का तो कोई  व्यक्ति ही नहीं है  केवल पुलिसको भ्रमित करने के लिए यह चरित्र स्थापित किया गया है। असली ज्वेल थीफ तो अशोक कुमार है।




इस फिल्म की सफलता के तीन शिल्पकार हैं विजय आनंद ,देव आनंद व सचिन देव बर्मन। फिल्म की पटकथा ,निर्देशन व संपादन विजय आनंद ने किया है जो इसके पहले गाइड जैसी क्लासिक को निर्देशित कर चुके थे। लेकिन यह एक बिलकुल ही अलग शैली की फिल्म थी। पटकथा पूरे समय दर्शकों को बंधे रखती है और दर्शक पूरे समय आश्चर्य मिश्रित रोमांच का अनुभव करता है। संपादन अवाम निर्देशन में एक उलझी हुई कहानी की सभी गुत्थियों को सुलझाया गया है। फिल्म का संगीत फिल्म को और गति प्रदान करता है तथा फिल्म में गानों का प्रस्तुतीकरण लाजबाब है। देव आनंद इस फिल्म में अपने पूरे मेनेरिस्म व अदाओं के साथ प्रस्तुत है व नायक के पात्र को जीवंत बनाते हैं। इस फिल्म में उनकी वो स्टाइलिश ज्वेल थीफ कैप अत्यंत लोकप्रिय हुई थी।  यहां उनके लिए रोमांस हेतु दो नायिकाएं व फ़्लर्ट करने हेतु तीन और अभिनेत्रियां हैं जो फिल्म को और मनोरंजक बनाती हैं। फिल्म के क्लाइमेक्स पर फिल्माया गया गीत “होठों पे ऐसी बात में दबा के चली आयी “का फिल्मांकन अदभुद है। जहां इसका संगीत क्लाइमेक्स के रोमांच को प्रकट करता है वहीँ वैजयंतीमाला का नृत्य व कैमरा एंगल्स देखते ही बनते है।लेकिन फिल्म के गीत कहीं से भी कहानी की गति को नहीं रोकते बल्कि उसका हिस्सा प्रतीत होते हैं।  फिल्म आज की फिल्मों की तरह गति शील है और आज ५० साल बाद देखने के बाद भी आज की फिल्मों की तरह ही लगती है।

कुल मिलकर यह एक असामान्य हिंदी मूवी है जो जो हॉलीवुड की सस्पेंस फिल्मों की तरह पूरा  रोमांच व कोतुहल पैदा करती है तथा आम हिंदी फिल्मों की तरह मनोरंजन व रोमांस से भी परिपूर्ण है।

Prakash Khare

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Retired Government Officer, Big Time Indian Cinema Fan, Old Film Encyclopedia
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