These Quotes from Kung fu Panda Series Can Be Your Life Mantras!

These Quotes from Kung fu Panda Series Can Be Your Life Mantras!

So I have watched Kung Fu Panda for the 80th time yesterday and hence was repeating a few of the quotes while watching it. I am sure those quotes are no less than a “Life Lessons” from some great guru! Here are what I have compiled.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Let us know which one is your favorite. Mine is all of them.

Om Puri – The University of Acting

Om Puri – The University of Acting

1970s में मेनस्ट्रीम व्यावसायिक सिनेमा की सुनहरी व सपनो की दुनिया से अलग  एक कठोर यथार्थवादी सिनेमा का उदय हो रहा था जिसकेसूत्रधार थे श्याम बेनेगल व गोविन्द निहलानी जैसे निर्देशक तो परदे पर इनके पात्रों को जीवंत करने की जबाबदारी थी नसीरुद्दीन शाह व ओम पूरी जैसे सामान्य सेदिखने वाले अभिनेताओं की जिन्होंने अपने लाजबाब अभिनय से  इस सामानांतर सिनेमा की सार्थकता को सिद्ध किया। आज सामानांतर यथार्थवादी सिनेमा के एकस्तम्भ का निधन हो गया। हालाँकि बाद मैं में उन्होंने मुख्य धारा  की फिल्मों में भी अपनी क़ाबलियत सिद्ध की लेकिन यहां हम उनकी उन पांच पेरफॉर्मन्सेस का ज़िक्रकरेंगे जिनको शायद आपने मिस किया होगा।

फिल्म आक्रोश का मजबूर आदिवासी किसान लाहन्या भीकू जो लगभग पूरी फिल्म में कुछ नहीं बोलता केवल अपने बोलते हुए चेहरे के भावों से अपने ऊपरहोने वाले अत्याचार व मजबूरी को अभिव्यक्त करता है। वह अपनी पत्नी के बलात्कार व उसकी मौत को बर्दाश्त करता है लेकिन फिल्म के अंत में अपनी अवयस्कबहिन पर होने वाले संभावित बलात्कार से बचाने के लिए उसकी हत्या कर देता है।

फिल्म आरोहण का गांव का  गरीब किसान जो १९६० के नक्सलबाड़ी आंदोलन से प्रभावित होकर भूमि स्वामियों द्वारा किये जा रहे अत्याचार के विरुद्ध लड़ताहै और अंत में सफल होने तक अपना सब कुछ खो देता है ,अपने परिवार को खो देता है और अंत में मर जाता है।

फिल्म अर्ध सत्य का आदर्शवादी पुलिस अफसर अनंत वेलंकर जो पुलिस ,माफिया व भ्रस्ट राजनीतिज्ञों के गठजोड़ से लड़ता है और सिस्टम के विरुद्ध अपनीविवशता को जिस तरह इस नायक ने प्रदर्शित किया है वह बेमिसाल है।और इस अभिनय के लिए उनको बेस्ट एक्टर का नेशनल अवार्ड भी मिला।

टेलीविज़न फिल्म तमस का चमार नत्थू जो ठेकेदार के कहने पर सुवर को मारता है जिसको एक मस्जिद के सामने फ़ेंक दिया जाता है और जिससे सांप्रदायिकहिंसा भड़क उठती है। नाथू इस सांप्रदायिक हिंसा के लिए खुद को जबाबदेह मानकर प्रायश्चित करता है। इस तरह के  जटिल किरदार शायद ओमपुरी के लिए ही बनेथे।

फिल्म मिर्च मसाला का वृद्ध मुस्लिम चौकीदार जो पूरे गांव में अकेला महिलाओं के पक्ष में सूबेदार के विरुद्ध खड़े होने का साहस दिखाता  है|

इस अद्वितीय अभिनेता को हमारी भाव भीनी श्रद्धांजलि।

50 Years of Jewel Thief

50 Years of Jewel Thief

भारतीय फिल्म इतिहास में एक्शन , थ्रिलर फिल्मों की परंपरा बहुत पुरानी है जो संभवतः नवकेतन की फिल्म “बाज़ी “से प्रारम्भ होती है।इसके बाद इसी  कड़ी में सस्पेंस फिल्मों का भी आगमन हो गया जिसमें “बीस साल बाद “व ” गुमनाम”जैसी फिल्में अत्यधिक लोकप्रिय हुईं। लेकिन इस शैली कीफिल्मों में जो नाम सबसे ऊपर लिया जाता है वह है नवकेतन की फिल्म ‘ज्वेल थीफ “|यह फिल्म अल्फ्रेड हिचकॉक के किसी सस्पेंस जासूसी उपन्यास  की तरह एकदूसरी दुनिया में ही ले जाती  है। दर्शक फिल्म की कहानी की उलझनों में उलझा  हुआ मह्शूश करता है और फिल्म के अंत में एक आश्चर्यजनक प्रसन्नता के साथब|हर निकलता है।

फिल्म का नायक विनय पुलिस कमिश्नर का बेटा है जिसे जवाहरातों में दिलचस्पी व महारत  है और इसी महारत के दम पर वह शहर के सबसेबड़े जोहरी सेठ विशवंभर दास के यहां नौकरी करने लगता है। तभी फिल्म  कहानी में कुछ ऐसे  पात्र आते है जो उसको अमर के नाम से पहचानते हैं।इन्ही में एकफिल्म की नायिका शालिनी है जो विनय से यह कहती है की वह उसकी यानी की अमर की मंगेतर है। यह दुबिधा तो दूर हो जाती है पर  यह स्थापित होने लगता हैकी शहर में हुई जवाहरातों की चोरी के पीछे प्रिंस अमर का हाथ है जिसकी शक्ल हूबहू विनय से मिलती है। विनय पुलिस के साथ मिलकर इस प्रिंस अमर की गुत्थीको सुलझाने का प्रयास करता है। इसी क्रम में कहानी आगे बढ़ती है और अंत में यह प्रकट होता है की प्रिंस अमर नाम का तो कोई  व्यक्ति ही नहीं है  केवल पुलिसको भ्रमित करने के लिए यह चरित्र स्थापित किया गया है। असली ज्वेल थीफ तो अशोक कुमार है।




इस फिल्म की सफलता के तीन शिल्पकार हैं विजय आनंद ,देव आनंद व सचिन देव बर्मन। फिल्म की पटकथा ,निर्देशन व संपादन विजय आनंद ने किया है जो इसके पहले गाइड जैसी क्लासिक को निर्देशित कर चुके थे। लेकिन यह एक बिलकुल ही अलग शैली की फिल्म थी। पटकथा पूरे समय दर्शकों को बंधे रखती है और दर्शक पूरे समय आश्चर्य मिश्रित रोमांच का अनुभव करता है। संपादन अवाम निर्देशन में एक उलझी हुई कहानी की सभी गुत्थियों को सुलझाया गया है। फिल्म का संगीत फिल्म को और गति प्रदान करता है तथा फिल्म में गानों का प्रस्तुतीकरण लाजबाब है। देव आनंद इस फिल्म में अपने पूरे मेनेरिस्म व अदाओं के साथ प्रस्तुत है व नायक के पात्र को जीवंत बनाते हैं। इस फिल्म में उनकी वो स्टाइलिश ज्वेल थीफ कैप अत्यंत लोकप्रिय हुई थी।  यहां उनके लिए रोमांस हेतु दो नायिकाएं व फ़्लर्ट करने हेतु तीन और अभिनेत्रियां हैं जो फिल्म को और मनोरंजक बनाती हैं। फिल्म के क्लाइमेक्स पर फिल्माया गया गीत “होठों पे ऐसी बात में दबा के चली आयी “का फिल्मांकन अदभुद है। जहां इसका संगीत क्लाइमेक्स के रोमांच को प्रकट करता है वहीँ वैजयंतीमाला का नृत्य व कैमरा एंगल्स देखते ही बनते है।लेकिन फिल्म के गीत कहीं से भी कहानी की गति को नहीं रोकते बल्कि उसका हिस्सा प्रतीत होते हैं।  फिल्म आज की फिल्मों की तरह गति शील है और आज ५० साल बाद देखने के बाद भी आज की फिल्मों की तरह ही लगती है।

कुल मिलकर यह एक असामान्य हिंदी मूवी है जो जो हॉलीवुड की सस्पेंस फिल्मों की तरह पूरा  रोमांच व कोतुहल पैदा करती है तथा आम हिंदी फिल्मों की तरह मनोरंजन व रोमांस से भी परिपूर्ण है।

Some Less Known Incidents About Lata Mangeshkar

Some Less Known Incidents About Lata Mangeshkar

लता मंगेशकर के दिलचस्प किस्से

लता और सचिन देव बर्मन :

१९५७ तक लता मंगेशकर पार्श्व गायन सचिन देव बर्मन संगीत निर्देशक के रूप में अपना सिक्का जमा चुके थे और दोनों ने सज़ा ,टैक्सी ड्राइवर ,देवदास जैसी फिल्मों में एक साथ काम करते हुए गजब के गीतों का सृजन किया था। लेकिन १९५७ में फिल्म पेइंग गेस्ट के गानेचाँद फिर निकलाके बाद लगभग पांच साल तक एक साथ काम नहीं किया। बात क्या हुई किसी को उस समय पता नहीं चला। दरअसल यह केवल अहम् का टकराव था। काफी बाद में लता मंगेशकर ने एक इंटरव्यू में कहा की सचिन दा  ने किसी से यह कि कह  दिया की लता  को लता किसने बनाया। इससे लता के स्वाभिमान को ठेस पहुंची और दोनों में बात चीत ही बंद हो गयी. वर्षों तक यह सिलसिला चला और इस दौरान सचिन दा ने लता के बगैर बेहतरीन संगीत का सृजन किया तो लता ने सचिन दा के बगैर ही नयी उचाईयों को प्राप्त किया।अंततः सचिन दा के बेटे पंचम की मध्यथता से यह डेडलॉक टूटा और फिल्म बंदिनी के गीतमोरा गोरा रंग लई लेके साथ ही इस संगीतमय सफर की दुबारा शुरुआत हुई।



लता और मुहम्मद रफ़ी :

यह दरअसल ६० के दशक के शुरआती सालों की बात है। लता मंगेशकर चाहती थी की गाने के मेहनताने के साथ साथ गानों  की बिक्री से प्राप्त आय से उनको रॉयल्टी भी मिले। उन्होंने यह बात रफ़ी साहब से कही क्योंकि वह जानती थी की रफ़ी साहेब सबसे बड़े पुरुष पार्श्व गायक हैं और अगर वो उनका साथ देते हैं तो निर्माताओं को झुकना पड़  जाएगा।लेकिन रफ़ी साहेब सामान्यता एक भद्र पुरुष माने जाते थे उन्होनें इस बात को मानने से इनकार कर दिया। उनका मन्ना था की जब हमको एक बार हमारे गाने का पारिश्रमिक मिल गया तो फिर रॉयल्टी  का कोई औचित्य नहीं है क्योंकि पारिश्रमिक तो हमें मिलता ही है चाहे गाने भले ही लोकप्रिय हो पाएं। इस बात पर दोनों में तकरार हो गयी और दोनों ने एक साथ नहीं गाने का फैसला ले लिया। यह सिलसिला भी लगभग पांच सालों तक चला। इस दौरान दोनों ही एक ही फिल्म में अलग अलग सोलो गीत गाते रहे लेकिन डुएट साथ नहीं गाये। लाता मंगेशकर ने युगल गीत जहाँ मुकेश महेंद्र कपूर किशोर कुमार के साथ गाये तो रफ़ी ने युगल गीत सुमन कल्याणपुर आशा भोसले शारदा के साथ गाये। यह पहला टकराव था जिससे लता को वास्तविक नुक्सान हुआ क्योंकि ज़्यादातर संगीत कार युगल गीतों में पुरुष आवाज़ रफ़ी साहेब की ही रखना चाहते थे इससे आशा भोसले सुमन कल्याणपुर को काफी फायदा मिला और शारदा जैसी नयी पार्श्व गायिका का उदय  हुआ. अंततः संगीतकार जय किशन की मध्यस्थता से तह झगड़ा सुलझा। काफी बाद में रफ़ी साहेब की मृत्यु के  बाद लता मंगेशकर ने एक इंटरव्यू में कहा की जय किशन के कहने पर रफ़ी साहेब ने उन्हें लिखित में एक माफ़ी नामा भेजा था जिससे सुलह हुई।  इस इंटरव्यू के बाद रफ़ी साहेब के पुत्र शाहिद ने यह आरोप लगाया की लता जी रफ़ी साहेब की मृत्यु के बाद झूठ बोल रही हैं।  रफ़ी साहेब ने ऐसा कोई माफीनामा नहीं भेज। और अगर भेज है तो उसे सार्वजनिक किया जाए।



ए मेरे वतन के लोगो

दरअसल चीन युद्ध के बाद २६ जनवरी को दिल्ली में होने वाले गणतंत्र दिवस के कार्यक्रमों में फिल्म जगत चार संगीतकारों नौशाद ,शंकर जय किशन ,मदन मोहन व सी रामचन्द्र को आमंत्रित किया गया थे की वे नेशनल  स्टेडियम में पंडित जवाहरलाल नेहरू के समक्ष देश भक्ति पूर्ण गीतों का गायन करें। इनमे से नौशाद ,शंकर जय किशन व मदन मोहन के पास उनकी फिल्मों से पूर्व में ही सृजित देश भक्ति’पूर्ण गीत थे किन्तु सी रामचंद्र के पास ऐसा कोई गीत नहीं था। इसलिए उन्होंने कवि  प्रदीप से आग्रह किया और इस तरह ऐ मेरे वतन के लोगो का सृजन हुआ। चूँकि उस समय सी राम चंद्र व लता मंगेशकर में किसी बात को लेकर अनबन चल रही थी तो सी रामचंद्र ने आशा भोसले से संपर्क कर उनको इस बात के लिए तैयार किया और गीत की रेहर्सल  भी शुरू हो गयी। लेकिन कवी प्रदीप को लगा की केवल लाता ही इस गीत के साथ न्याय कर सकती हैं। उन्होंने लता मंगेशकर से प्रथक से संपर्क किया व अंततः उन्हें इसके लिए मना  लिया। जब उन्होंने ये बात सी रामचंद्र को बताई तो वे असमंजस में पड़ गए। खैर काफी जद्दोजहद के बात यह तय हुआ की लता व आशा दोनों ही इस गीत पर दिल्ली में परफॉर्म करेंगी और तदनुसार रेहर्सल शुरू हो गयी। लेकिन जैसे ही यह तिथि निकट आने लगी लता मंगेशकर ने कहा की सिर्फ वे ही दिल्ली जाकर परफॉर्म करने वाली हैं आशा दिल्ली नहीं जा रही है। जब सी राम चंद्र ने आशा भोसले से संपर्क किया तो उन्होंने कहा की दीदी उन्हें दिल्ली नहीं जाने देना चाहती। ऐन वक़्त पर आशा भोसले ने इस कार्यक्रम से नाम वापस ले लिया और केवल लता मंगेशकर ने दिल्ली में परफॉर्म किया। आगे का इतिहास सबको पता है लेकिन परदे के पीछे क्या हुआ यह अब भी एक रहस्य है।

नई उभरती हुई महिला पार्श्व गायिकाओं के सम्बन्ध में लता मंगेशकर के रवैये पर हमेशा प्रश्न चिन्ह रहा है। यहाँ तक की छोटी बहिन आशा भोसले ने भी एक इंटरव्यू के दौरान यह कह डाला की यदि लता दीदी ने उनकी थोड़ी बहुत मदद की होती तो उन्हें अपना मुकाम हासिल करने के लिए इतना संघर्ष नहीं करना पड़ता। ऐ मेरे वतन के लोगो से सम्बंधित घटना इस तथ्य को थोड़ा बहुत तथ्यपरक बनाती है। इसके अलावा भी अन्य पार्श्व गायिकाओं जैसे सुमनकल्याणपुर,शारदा  वाणी जयराम, हेमलता ,सुलक्षणा पंडित ,रूना  लैला आदि भी लता मंगेशकर के इस रवैये की कभी न कभी शिकार हुई हैं। और उनके विभिन्न साक्षात्कारों में उनकी यह पीड़ा कहीं न कहीं परिलक्षित हुई है। लेकिन 1970 में लता जी ने स्वयं दुसरो को आगे बढ़ने के लिए खुद फ़िल्मफ़ेअर अवार्ड लेने से मन कर दिया था और उनका आखिरी फ़िल्मफ़ेअर  फिल्म दो रास्ते के गीत बिंदिया चमकेगी से मिला था हालाँकि यह तो नहीं कहा जा सकता की ये सभी गायक लता मंगेशकर के समान प्रतिभावान थे लेकिन लाता मंगेशकर रुपी वटवृक्ष के नीचे  इन नयी प्रतिभाओं को फूलने फलने के पर्याप्त अवसर नहीं मिले इसमें किसी को कोई शंका नहीं हो सकती।

लता  और शंकर

इसके अतिरिक्त जिन संगीतकारों ने नयी पार्श्व गायिकाओं को अवसर देने की कोशिश की उनके साथ भी लता मंगेशकर का रवैया तिरिस्कारपूर्ण रहा। ६० के दशक के उत्तराद्ध में संगीतकार शंकर जय किशन की जोड़ी में कुछ दरार पैदा हुई क्योंकि लाता मंगेशकर के रवैये से परेशान होक संगीतकार शंकर ने नयी पार्श्व गायिका शारदा को बढ़ावा देना प्रारम्भ किया और कई फिल्मों जैसे सूरज ,अराउंड दी  वर्ल्ड ,गुनाहों का देवता आदि में लता की जगह शारदा से पार्श्व गायन करवाया। इससे चिढ़कर लाता मंगेशकर ने शंकर जय किशन के संगीत निर्देशन में गाना बंद कर दिया। इसी कारण से मेरा नाम जोकर जैसी महत्वाकांक्षी फिल्म में भी लता मंगेशकर का कोई गीत नहीं था। इसी बीच जय किशन जी का अवसान हो गया। शारदा इतने बैकअप के बाद भी कोई स्थायी प्रभाव उत्पन्न नहीं कर पायीं और शंकर जय किशन के संगीत का जादू भी काम होने लगा। अंततः मोहम्मद रफ़ी की मध्यस्थता से यह अवरोध दूर हुआ और दोनों ने फिर से फिल्म सन्यासी में एक साथ काम किया और इसका संगीत पुनः लोकप्रिय हुआ।



Jis Desh Mein Ganga Behti hai – India’s Most Honest Dacoit Movie

Jis Desh Mein Ganga Behti hai – India’s Most Honest Dacoit Movie

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आज़ादी के साथ बहुत सी अन्य समस्याओं के साथ डाकू समस्या भी देश को विरासत में मिली जो सदियों से चली आ रही आर्थिक व सामजिक असमानता की उपज थी व जिसे केवल पुलिस या सैन्य अभियान से रोका जाना मुश्किल था। भारतीय फिल्मों में अधिकतर इन डाकुओं के अँधेरे पक्ष या नकारात्मक पहलु को ही प्रदर्शित किया गया है पर १९६० में प्रदर्शित फिल्म जिस देश में गंगा बहती है में पहली बार राजकपूर ने इन डाकुओं की संवेदनाओं व उनकी असल ज़िन्दगी की जद्दोजहद को उजागर करते हुए उनके पुनर्वास को मुख्य मुद्दा बनने का साहस किया ।
फिल्म का नायक राजू गा बजाकर ज़िन्दगी बसर करने वाला एक भोला भला भाट है जो डाकुओं की एक गैंग के सरदार को बचाता है। गैंग के अन्य डाकू उसे पुलिसवाला समझ कर उठा ले जाते है लेकिन गैंग का सरदार उसकी सच्चाई को जानते हुए उसे इज़्ज़त देते हुए उसकी आव भगत करता है। सरदार की बेटी कम्मो उसके भोलेपन पर मुग्ध होकर उससे प्यार करने लगती है। लेकिन वह भोले भले राजू को यह समझ|ने में सफल हो जाती है की वो लोग डाकू नहीं बल्कि समाज को बराबर करने वाले समाज सुधारक हैं। लेकिन राजू को एक दिन यह सच्चाई पता लग जाती है। और वह जाकर पुलिस को सब सच्चाई बता देता है। पुलिस गैंग को समाप्त करने की योजना बनती है किन्तु राजू यह चाहता है की डाकू सरेंडर करके मुख्या धारा में सम्मलित होकर आम ज़िन्दगी जिए। आख़िरकार वह काफी जद्दोजहद के बाद अपने उद्देश्य में सफल हो जाता है।
फिल्म का निर्देशन राजकपूर के सहायक रहे राधू करमाकर ने किया है जिसमे राजकपूर की शोमैन वाली छाप स्पस्ट तौर पर नज़र आती है। राजकपूर की अन्य तरह फिल्म की कहानी को बृहत्तर स्केल पर कसी हुई पटकथा के साथ मनोरंजक तरीके से कहने का सफल प्रयास किया गया है। फिल्म में शंकर जयकिशन का संगीत फिल्म की पृष्ठभूमि के अनुरूप एवं अत्यन्त लोकप्रिय व कर्णप्रिय बन पड़ा है| गीतकार शैलेन्द्र व हसरत जयपुरी के फिल्म के गीत पटकथा की मांग के अनुसार फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाते है और कई जगहों पर अत्यन्त संवेदनशील बन पड़े हैं ख़ास तौर पर फिल्म के गीत” प्यार कर ले नई तो फँसी चढ़ जायेगा “व “आ अब लौट चलें” फिल्म की पुरे उद्देश्य को बयां कर देते हैं।
फिल्म में भोले भले राजू की भूमिका राजकपूर ने अत्यन्त सहजता से निभाई है व गम्भीर कहानी में सहज हास्य भी उत्पन्न किया है व इसके लिए उन्हें फिल्मफेयर का सर्वेश्रेष्ठ अभिनेता का पुरूस्कार भी मिला है| फिल्म की नायिका के रूप पद्मिनी ने जहाँ सरदार की बेटी के रूप में अक्खड़पन प्रदर्शित किया है वहीँ राजकपूर के साथ रोमांटिक अनुभूति भी जगाने में सफल रहीं हैं। अभिनेता प्राण ने राका के रूप में एक खूंखार डाकू का चरित्र दृढता से निभाया है।राजकपूर की अन्य फिल्मों की तरह इस फिल्म में भी ललिता पवार की एक महत्वपूर्ण भूमिका है व उन्होंने एक डाकू की संवेदनशील पत्नी व माँ की भूमिका पूरी दक्षता से निभाई है।

फिल्म के अंत में राजू सभी डाकू परिवारों को समर्पण के लिए तैयार कर लेता है। वहीँ एक गलत सूचना के चलते पुलिस डाकुओं पर हमला करने निकल देती है. जब दोनों का आमना सामना होता है तो राजू डाकुओं के परिवारी, महिलाओं और बच्चों को ढाल बन कर दोनों पक्षों के बीच ला खड़ा कर देता है. बच्चों को देख दोनों पक्ष बंदूकें गिर देते है! अहिंसा का सच्चा उदाहरण सिनेमा में देखने को मिलता है. ये भारतीय सिनेमा के सबसे प्रभावशाली क्लाइमेक्स सीने में से एक है.
कुल मिलकर जिस देश में गंगा बहती है एक उद्देश्यपूर्ण मनोरंजक व संवेदनशील फिल्म बन पड़ी है जो बॉलीवुड की सरवकलिक महान फिल्मों की श्रेणी में आती है।