हृषिकेश मुख़र्जी के ९१वे जन्मदिन पर एक श्रद्धांजलि

हृषिकेश मुख़र्जी के ९१वे जन्मदिन पर एक श्रद्धांजलि

हृषिकेश मुखर्जी के फ़िल्मी रंगमंच के ज़िन्दगी से भरे पांच फ़िल्मी किरदार

हृषिकेश मुखर्जी, सिनेमा का वो दीपक हैं जो तब तक जलता रहेगा जब तक सिनेमा रहेगी. हृषिदा जादूगर थे, सिनेमा के वो जादूगर जिनका जादू आज भी हमको मंत्रमुग्ध करता है. चाहे वो अनारी हो या आनंद, गुड्डी हो या गोलमाल, नौकरी हो या नमक हराम, खूबसूरत हो या चुपके चुपके, अनुपमा हो या सत्यकाम, बावर्ची हो या मेमदीदी, हर एक फिल्म एक सौगात है हम आमजनता के लिए. ये कहानियां उन्होंने इसलिए सुनायीं क्योंकि ये हमारी कहानियां थीं. आज उनका ९१वां जन्मदिन है…आइये मिलते हैं हृषिदा की फिल्मों सबसे जीवंत और अनूठे किरदारों से….

आनंद मरा नहीं, आनंद मरते नहीं

आनंद मरा नहीं, आनंद मरते नहीं

आनंद

दिल्ली से जब आनंद सहगल अपना इलाज कराने मुंबई आता है तो मुंबई में वो एक डॉक्टर को छोड़कर किसी को भी नहीं जानता, बस इतना जानता है, वो अब ज्यादा जीने नहीं वाला. मुंबई आकर वो अपनी बची हुई ज़िन्दगी लोगों से दोस्ती करने में बिताता है. दोस्तों की ज़िन्दगी में खुशियाँ भरने में लगाता है, मरने से पहले यही उसका आखरी काम रह जाता है. वो अपने पेशे से मायूस डॉक्टर भास्कर को ज़िन्दगी का मतलब सिखाता है. वो डॉक्टर भास्कर को ये सिखाता है, की ज़िन्दगी लम्बी नहीं बड़ी होनी चाहिए.

अब आप ही बताइए, जब TO टू, DO डू, तो GO गू क्यों नहीं....

अब आप ही बताइए, जब TO टू, DO डू, तो GO गू क्यों नहीं….

प्रोफेसर परिमल त्रिपाठी

धर्मेन्द्र ने कई शानदार फिल्में की हैं, पर वो अगर किसी एक किरदार के लिए हमेशा किलकारियों के साथ याद किये जाते हैं तो वो है प्रोफेसर परिमल त्रिपाठी, जो की उन्हें हृषिकेश मुखर्जी की फिल्म चुपके चुपके में मिला. फिल्म चुपके चुपके में प्रोफेसर परिमल त्रिपाठी का किरदार यक़ीनन बॉलीवुड के सबसे ज्यादा कॉमिक किरदारों में से है. प्रोफेसर त्रिपाठी के ‘जिज्जा जी‘, उनकी बीवी सुलेखा की नज़र में भगवान् हैं. जैसे एक मयान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं वैसे ही एक मनमंदिर में दो भगवान् कैसे रहे. इसलिए बॉटनी के प्रोफेसर परिमल त्रिपाठी, पहुँच जाते हैं जीजा जी …के ‘जीवन में विश घोलने’… एक अत्यंत शुद्ध हिंदी बोलने वाला वाहनचालक यानी ड्राईवर बन के, फिर क्या है, जीजा जी की ज़िन्दगी नर्क हो जाती है और परिमल अपने मकसद में कामयाब हो जाता है.

ये सब तो हम 'निर्मल आनंद ' के लिए कर रहे हैं

ये सब तो हम ‘निर्मल आनंद ‘ के लिए कर रहे हैं

मंजू

मंजू का किरदार यक़ीनन हृषिकेश मुखर्जी द्वारा रचे गए सबसे आज़ाद ख़याल किरदारों में से एक था, मंजू अल्हड है, शरारती है, बेहद खुश मिजाज़ है और सूरत ही नहीं, दिल से भी बड़ी खूबसूरत है.फिल्म आनंद के आनंद और फिल्म खूबसूरत की मंजू में काफी समानताएं हैं, आनंद की तरह उसे भी दोस्त बनाने का बड़ा शौक है, दोनों ही मानते हैं, की ज़िन्दगी जितनी हंसी ख़ुशी में गुज़रे उतना अच्छा. दोनों ही मानते हैं, की समय की तलवार के साए में ज़िन्दगी नहीं कट सकती, पर ख़ुशी बांटते हुए ज़िन्दगी जीने से वो अपने लिए ही नहीं दूसरों के लिए भी गुलज़ार हो जाती है इतना ही नहीं  मंजू और आनंद दोनों को ही नियम तोड़ने का बड़ा शौक है, और दोनों ही ज़िन्दगी को अनमोल मानते हैं इसीलिए शायद आनंद हो या खूबसूरत,इन किरदारों के माध्यम से हृषिदा आपको ज़िन्दगी के पल पल को जीना सिखाते हैं. ज़िन्दगी जियो तो निर्मल आनंद के लिए, कहती है मंजू.

 

इट्स सो सिंपल तो बि हैप्पी, बट इट्स सो डिफिकल्ट तो बी सिंपल

इट्स सो सिंपल तो बि हैप्पी, बट इट्स सो डिफिकल्ट तो बी सिंपल

रघु

रघु एक बावर्ची है, पर शान्ति निवास के अशांत निवासियों के लिए रघु फ़रिश्ता है. जब वो इस घर में आता है तो देखता है की परिवार रुपी माला के सभी फूल बिखरे हुए हैं, और मुर्जाये जा रहे हैं. वो धीरे धीरे इन्हें एक माला में पिरोता है और फिर चुप चाप निकल जाता है एक दुसरे अशांत घर की तलाश में जहां उसकी ज़रुरत है. आज के समय में कोई भी सुपरस्टार एक खाकी निक्कर वाला बावर्ची बनने को भले ही न राज़ी हो पर उस समय रघु को सुपरस्टार राजेश खन्ना ने शान के साथ अदा किया. ज़िन्दगी में खुशियाँ ज़रूरी हैं, हर कोई अपनी ज़िन्दगी खुश रहने के लिए ही जीता है, ये बावर्ची अनूठा है, ये बावर्ची झूठा है, ये बावर्ची भी आनंद, परिमल और मंजू की तरह बड़ी बकबक करता है पर इसकी बक बक में भी ज़िन्दगी की कई सीखें छुपी हुई हैं. ये बावर्ची बताता है की जीवन की खुशियाँ एक दुसरे को मुस्कुराने में ही हासिल की जा सकती हैं.

जिसका नाम भवानी शंकर हो वो तो पैदा होते ही बुद्धा हो हया समझो

जिसका नाम भवानी शंकर हो वो तो पैदा होते ही बुद्धा हो हया समझो

रामप्रसाद और लक्ष्मनप्रसाद

याद आया कौन सी फिल्म की बात की जा रही है? बात की जा रही है बॉलीवुड की सबसे शानदार कोमेडिज़ में से एक गोलमाल की. फिल्म गोलमाल का रामप्रसाद मुसीबत का मारा है, उसको नौकरी की सख्त ज़रूरत है पर नौकरी देने वाले भवानी शंकर अजीब किस्म के इंसान हैं, जो इंसान को उसकी मूंछ और पहनावे से आंकते हैं, रामप्रसाद पहनावा तो बदल लेता है पर साथ ही नौकरी बचने के लिए उसको अपने जुड़वाँ भाई लक्षमणप्रसाद होने का नाटक भी करना पड़ता है. दोनों को मिलाकर कर अब उसका बस एक ही मकसद है, भवानीशंकर को ये सिखाना की किताब का कवर देखकर ये नहीं बताया जा सकता की उसके अन्दर क्या लिखा है. रामप्रसाद भी आनंद, रघु, परिमल और मंजू की तरह मस्त मौला है, नौटंकी करना उसे अच्छा लगता है और वो भी इन सब की तरह नियम और कायदे कानून में बंधी हुई ज़िन्दगी के खिलाफ है. हृषिदा द्वारा उकेरा गया रामप्रसाद उर्फ़ लक्ष्मनप्रसाद भारतीय सिनेमा पटल का वो किरदार है जो सदियों तक जिंदा रहेगा.

 

 

Yohaann Bhaargava
Follow me:

Yohaann Bhaargava

Head - Business Development at SCRIPTORS
Movie Buff. Yohaann is a film critic with Jagran Prakashan Limited. He has been associated with Print and TV media as a branding professional. Presently he is a screenwriter trying to bring in some good scripts up for Bollywood. At Scriptors he works as a writer and handles business development.
Yohaann Bhaargava
Follow me:

Latest posts by Yohaann Bhaargava (see all)