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आज़ादी के साथ बहुत सी अन्य समस्याओं के साथ डाकू समस्या भी देश को विरासत में मिली जो सदियों से चली आ रही आर्थिक व सामजिक असमानता की उपज थी व जिसे केवल पुलिस या सैन्य अभियान से रोका जाना मुश्किल था। भारतीय फिल्मों में अधिकतर इन डाकुओं के अँधेरे पक्ष या नकारात्मक पहलु को ही प्रदर्शित किया गया है पर १९६० में प्रदर्शित फिल्म जिस देश में गंगा बहती है में पहली बार राजकपूर ने इन डाकुओं की संवेदनाओं व उनकी असल ज़िन्दगी की जद्दोजहद को उजागर करते हुए उनके पुनर्वास को मुख्य मुद्दा बनने का साहस किया ।
फिल्म का नायक राजू गा बजाकर ज़िन्दगी बसर करने वाला एक भोला भला भाट है जो डाकुओं की एक गैंग के सरदार को बचाता है। गैंग के अन्य डाकू उसे पुलिसवाला समझ कर उठा ले जाते है लेकिन गैंग का सरदार उसकी सच्चाई को जानते हुए उसे इज़्ज़त देते हुए उसकी आव भगत करता है। सरदार की बेटी कम्मो उसके भोलेपन पर मुग्ध होकर उससे प्यार करने लगती है। लेकिन वह भोले भले राजू को यह समझ|ने में सफल हो जाती है की वो लोग डाकू नहीं बल्कि समाज को बराबर करने वाले समाज सुधारक हैं। लेकिन राजू को एक दिन यह सच्चाई पता लग जाती है। और वह जाकर पुलिस को सब सच्चाई बता देता है। पुलिस गैंग को समाप्त करने की योजना बनती है किन्तु राजू यह चाहता है की डाकू सरेंडर करके मुख्या धारा में सम्मलित होकर आम ज़िन्दगी जिए। आख़िरकार वह काफी जद्दोजहद के बाद अपने उद्देश्य में सफल हो जाता है।
फिल्म का निर्देशन राजकपूर के सहायक रहे राधू करमाकर ने किया है जिसमे राजकपूर की शोमैन वाली छाप स्पस्ट तौर पर नज़र आती है। राजकपूर की अन्य तरह फिल्म की कहानी को बृहत्तर स्केल पर कसी हुई पटकथा के साथ मनोरंजक तरीके से कहने का सफल प्रयास किया गया है। फिल्म में शंकर जयकिशन का संगीत फिल्म की पृष्ठभूमि के अनुरूप एवं अत्यन्त लोकप्रिय व कर्णप्रिय बन पड़ा है| गीतकार शैलेन्द्र व हसरत जयपुरी के फिल्म के गीत पटकथा की मांग के अनुसार फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाते है और कई जगहों पर अत्यन्त संवेदनशील बन पड़े हैं ख़ास तौर पर फिल्म के गीत” प्यार कर ले नई तो फँसी चढ़ जायेगा “व “आ अब लौट चलें” फिल्म की पुरे उद्देश्य को बयां कर देते हैं।
फिल्म में भोले भले राजू की भूमिका राजकपूर ने अत्यन्त सहजता से निभाई है व गम्भीर कहानी में सहज हास्य भी उत्पन्न किया है व इसके लिए उन्हें फिल्मफेयर का सर्वेश्रेष्ठ अभिनेता का पुरूस्कार भी मिला है| फिल्म की नायिका के रूप पद्मिनी ने जहाँ सरदार की बेटी के रूप में अक्खड़पन प्रदर्शित किया है वहीँ राजकपूर के साथ रोमांटिक अनुभूति भी जगाने में सफल रहीं हैं। अभिनेता प्राण ने राका के रूप में एक खूंखार डाकू का चरित्र दृढता से निभाया है।राजकपूर की अन्य फिल्मों की तरह इस फिल्म में भी ललिता पवार की एक महत्वपूर्ण भूमिका है व उन्होंने एक डाकू की संवेदनशील पत्नी व माँ की भूमिका पूरी दक्षता से निभाई है।

फिल्म के अंत में राजू सभी डाकू परिवारों को समर्पण के लिए तैयार कर लेता है। वहीँ एक गलत सूचना के चलते पुलिस डाकुओं पर हमला करने निकल देती है. जब दोनों का आमना सामना होता है तो राजू डाकुओं के परिवारी, महिलाओं और बच्चों को ढाल बन कर दोनों पक्षों के बीच ला खड़ा कर देता है. बच्चों को देख दोनों पक्ष बंदूकें गिर देते है! अहिंसा का सच्चा उदाहरण सिनेमा में देखने को मिलता है. ये भारतीय सिनेमा के सबसे प्रभावशाली क्लाइमेक्स सीने में से एक है.
कुल मिलकर जिस देश में गंगा बहती है एक उद्देश्यपूर्ण मनोरंजक व संवेदनशील फिल्म बन पड़ी है जो बॉलीवुड की सरवकलिक महान फिल्मों की श्रेणी में आती है।

Prakash Khare

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Retired Government Officer, Big Time Indian Cinema Fan, Old Film Encyclopedia
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