1970s में मेनस्ट्रीम व्यावसायिक सिनेमा की सुनहरी व सपनो की दुनिया से अलग  एक कठोर यथार्थवादी सिनेमा का उदय हो रहा था जिसकेसूत्रधार थे श्याम बेनेगल व गोविन्द निहलानी जैसे निर्देशक तो परदे पर इनके पात्रों को जीवंत करने की जबाबदारी थी नसीरुद्दीन शाह व ओम पूरी जैसे सामान्य सेदिखने वाले अभिनेताओं की जिन्होंने अपने लाजबाब अभिनय से  इस सामानांतर सिनेमा की सार्थकता को सिद्ध किया। आज सामानांतर यथार्थवादी सिनेमा के एकस्तम्भ का निधन हो गया। हालाँकि बाद मैं में उन्होंने मुख्य धारा  की फिल्मों में भी अपनी क़ाबलियत सिद्ध की लेकिन यहां हम उनकी उन पांच पेरफॉर्मन्सेस का ज़िक्रकरेंगे जिनको शायद आपने मिस किया होगा।

फिल्म आक्रोश का मजबूर आदिवासी किसान लाहन्या भीकू जो लगभग पूरी फिल्म में कुछ नहीं बोलता केवल अपने बोलते हुए चेहरे के भावों से अपने ऊपरहोने वाले अत्याचार व मजबूरी को अभिव्यक्त करता है। वह अपनी पत्नी के बलात्कार व उसकी मौत को बर्दाश्त करता है लेकिन फिल्म के अंत में अपनी अवयस्कबहिन पर होने वाले संभावित बलात्कार से बचाने के लिए उसकी हत्या कर देता है।

फिल्म आरोहण का गांव का  गरीब किसान जो १९६० के नक्सलबाड़ी आंदोलन से प्रभावित होकर भूमि स्वामियों द्वारा किये जा रहे अत्याचार के विरुद्ध लड़ताहै और अंत में सफल होने तक अपना सब कुछ खो देता है ,अपने परिवार को खो देता है और अंत में मर जाता है।

फिल्म अर्ध सत्य का आदर्शवादी पुलिस अफसर अनंत वेलंकर जो पुलिस ,माफिया व भ्रस्ट राजनीतिज्ञों के गठजोड़ से लड़ता है और सिस्टम के विरुद्ध अपनीविवशता को जिस तरह इस नायक ने प्रदर्शित किया है वह बेमिसाल है।और इस अभिनय के लिए उनको बेस्ट एक्टर का नेशनल अवार्ड भी मिला।

टेलीविज़न फिल्म तमस का चमार नत्थू जो ठेकेदार के कहने पर सुवर को मारता है जिसको एक मस्जिद के सामने फ़ेंक दिया जाता है और जिससे सांप्रदायिकहिंसा भड़क उठती है। नाथू इस सांप्रदायिक हिंसा के लिए खुद को जबाबदेह मानकर प्रायश्चित करता है। इस तरह के  जटिल किरदार शायद ओमपुरी के लिए ही बनेथे।

फिल्म मिर्च मसाला का वृद्ध मुस्लिम चौकीदार जो पूरे गांव में अकेला महिलाओं के पक्ष में सूबेदार के विरुद्ध खड़े होने का साहस दिखाता  है|

इस अद्वितीय अभिनेता को हमारी भाव भीनी श्रद्धांजलि।

Prakash Khare

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Retired Government Officer, Big Time Indian Cinema Fan, Old Film Encyclopedia
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