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हृषिकेश मुख़र्जी ने एक से एक बेहतरीन फिल्मों का सृजन किया है लेकिन उनकी स्वयं की पसंदीदा फिल्म  वर्ष  १९६९ में प्रदर्शित फिल्म सत्यकाम रही है। आलोचकों को इस फिल्म में  यही कमी नज़र आयी की फिल्म के नायक  का चरित्र अकल्पनीय रूप से आदर्शवादी व्यक्ति का है जो इस दुनिया का नज़र नहीं आता है। लेकिन फिल्म की कहानी की पृष्ठभूमि को देखें तो इस आदर्शवादिता को न्यायोचित ठहराया जा सकता है|फिल्म की कहानी की पृष्ठभूमि स्वतंत्रता के ठीक पहले की है जब देश का युवा भविष्य में होने वाले सकारात्मक परिवर्तन के सपने देख रहा था और स्वंतंत्रता संग्राम के कारण उसके मन मस्तिष्क में ईमानदारी और आदर्शवाद की तरंगे हिलोरे मार रही थी। और इन्ही परिस्थितियों की उपज थी इस फिल्म का नायक – सत्यप्रिय आचार्य। लेकिन स्वतंत्रता के बाद स्थापित लोकतंत्र में सत्ता में लोक की भागीदारी तो होती है लेकिन तंत्र नहीं बदलता। यहीं इस नायक के आदर्शवाद का टकराव इस भ्रस्ट तंत्र से बार बार होता है लेकिन वह कहीं भी अपने आदर्शवाद से समझौता नहीं करता। केवल एक जगह वह कमजोर पड़ता है जबकि वह फिल्म की नायिका को एक भ्रस्ट और अय्याश राजकुमार की हवश का शिकार बनने से रोकने की कोशिश नहीं करता। लेकिन इस घटना के बाद पुनः उसका ज़मीर जागता है और वह उस हवश का शिकार बनी नायिका व उस घटना से उत्पन्न बच्चे को अपनाता है। जिसके कारन उसे अपने धार्मिक आचार विचार वाले दादाजी के द्वारा भी बहिस्कृत कर दिया जाता है| नायक को अपनी ईमानदारी और आदर्शवादिता के कारण हर जगह मुश्किलों का सामना करना पड़ता है और अंततः वह कैंसर का शिकार हो जाता है इसके बाद वह अपनी पत्नी व बच्चे के भविष्य की खातिर पुनः समझौता करते हुए दीखता है परन्तु तब तक नायक के साथ संघर्ष करते करते उसकी नायिका पत्नी इतनी इतनी मजबूत हो चुकी होती है की वह उस भ्रस्ट समझौते के कागजो को फाड़ कर फ़ेंक देती है क्योंकि वह आदर्शवादी नायक को उसके अंतिम समय में हारते हुए नहीं देखना चाहती। इस समय पर मरता हुआ नायक मुस्कुराता है और यह मुस्कराहट नायक की विजय को दर्शाती है की उसने कम से  कम एक व्यक्ति को तो बदल दिया है। अंततः उसके मरने के वाद बच्चे के मुख से सत्य वचन सुनकर दादाजी भी द्रवित होकर नायिका और उसके बच्चे को अपना लेते है

 निस्संदेह यह धर्मेन्द्र के फ़िल्मी कॅरियर में अभिनय का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन है। एक ईमानदार और आदर्शवादी नायक के चरित्र को उन्होंने बखूबी निभाया है। सामान्यतया रफ़ टफ चरित्र निभाने वाले धर्मेन्द्र में एक ऐसे चरित्र के अनरूप आवश्यक दृढ़ता व सौम्यता दोनों स्पस्ट रूप से परिलक्षित होती हैं। सत्य को बिना लागलपेट के कहने की उनकी शैली अद्भुद है। जब वह अपने दादाजी से अपने बच्चे के बारे में कहते हैं की “यह बच्चा मेरा है लेकिन मुझसे नहीं है” तो दर्शक स्तब्ध रह जाता है। इतनी कठोर सत्यता को इतनी बेबाकी व सजहता से बोलने का कारण यह दृश्य फिल्म का हाई पॉइंट बन पड़ा है। इसके अतिरिक्त अपनी आदर्शवादिता के कारण मुश्किलों उठाते हुए नायक के चरित्र में उत्पन्न हठधर्मिता खीज व कुंठित अहंकार को भी धर्मेन्द्र ने बखूबी प्रदर्शित किया है।

दूसरी ओर इसके पहले ग्लैमर भूमिकाएं निभाने वाली शर्मीला टैगोर ने पहले एक हवश का शिकार होने वाली मजबूर महिला व आगे आदर्शवादी नायक के साथ मुश्किलों का सामना उठाती हुई कुंठाग्रस्त पत्नी के चरित्र को बखूबी निभाया है फिल्म के अंत में जब नायिका नायक द्वारा हस्ताक्षरित अनैतिक समझौते के कागज़ों को फाड़  देती है और नायक के मुस्कुराने पर कहती है की तुम्हे पता था की मैं यह फाड़ दूँगी तो यह दृश्य बहुत ही मार्मिक बन पड़ा है और फिल्म का दूसरा हाई पॉइंट है।

फिल्म का तीसरा हाई पॉइंट है जब नायिका का बच्चा यह कहता है क़ि दादाजी झूठ बोल रहे हैं ये हमें इसलिए नहीं ले जाना चाहते की में बाबूजी का बेटा नहीं हूँ मुझे माँ ने सब कुछ बता दिया है और माँ कभी झूठ नहीं बोलती है। यहाँ निर्देशक ने यह बतलाने की कोशिश की है की बच्चे के रूप में नायक कि सच्चाई बोलती है और सत्यप्रिय के रूप में सत्यकाम गया है। फिल्म की कहानी सहनायक संजीव कुमार के द्वारा कही गयी है जो एक अच्छा व्यक्ति तो है नायक से पूरी हमदर्दी रखता है लेकि कोरे कठोर आदर्शवाद की जगह मुलायम ईमानदारी से समझौते करते हुए ऊपर उठता जाता है और एक खुशहाल ज़िन्दगी जीता है।

हृषिकेश मुख़र्जी अपनी  विशिष्ट  निर्देशन शैली के कारण विख्यात रहे है जिसमे वह कहानी को बड़ी सजहता से बिना नाटकीयता के  चित्रपट पर उतारते हैं और यहाँ भी वह अपनी उसी परंपरा का निर्वाह करते हुए दीखते हैं। इस फिल्म के संवाद विशिष्ट है क्योंकि इसमें सत्य को कितनी सहजता से कहा जा सकता है यह दर्शाया गया है। इसी कारण संवाद लेखक राजिन्द्र सिंह वेदी को इस फिल्म से फिल्म फेयर का वर्षा के सर्वश्रेष्ठ संवाद का पुरूस्कार प्राप्त हुआ है। कुल मिलाकर बेहतरीन कहानी श्रेष्ठ पटकथा ,सहज अभिनय बेहतरीन संवाद व निर्देशन ने फिल्म को अविस्मरणीय बना दिया है व यह बॉलीवुड की सर्वकालिक महान क्लासिक फिल्मों में से एक है।

Prakash Khare

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Retired Government Officer, Big Time Indian Cinema Fan, Old Film Encyclopedia
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