प्रसिद्ध फिल्मकार बिमल राय की फ़िल्में अक्सर ऐसी कहानियाँ कहती हुई होती हैं जिन्हें देख-सुन कर हम सोचने को मजबूर और कुछ करने को उद्यत हो जाते हैं। कहा जाता है कि साहित्य, कलाएँ और फ़िल्में समाज का दर्पण होती हैं। इनमें वही दिखाया जाता है जो तत्कालीन समाज में हो रहा होता है। लेकिन इसके साथ ही एक दूसरा पक्ष है कि वे समाज को एक दिशा भी देती हैं। १९५९ में प्रदर्शित “सुजाता” भी एक ऐसी ही कहानी है जिसमें ये दोनों ही पहलू भरपूर देखे जाते हैं। अगर आप साहित्य में रूचि रखने वाले हैं तो इस फिल्म के कथानक को आप बड़ी ही सहजता से अपने आँखों के सामने घटित होता पाएँगे। १९५०-१९६० के दशकों का वह दौर, जब हम विदेशी दासता से तो मुक्त हो चुके थे लेकिन अपनी सामाजिक रूढ़ियों और बुराइयों से नहीं, इस फिल्म के माध्यम से हमारे सामने तैरने लगता है।

कहानी शुरू होती है मानव की मानव के प्रति करुणा के नैसर्गिक गुण को लिए जब एक उच्च-मध्यम वर्गीय परिवार के उपेन्द्रनाथ चौधरी और उनकी पत्नी चारु अपनी बेटी रमा की हमउम्र एक नवजात बच्ची को उसके अछूत माता-पिता के बस्ती में फैले हैजे की भेंट चढ़ जाने के बाद कुछ समय के लिए अपने घर में रखने की इजाज़त देते हैं। देखने की बात है कि जिस चारु को आप लगभग पूरी ही फिल्म में ऐसा पाते हैं जो कभी भी पूरी तरह से उस बच्ची को अपना नहीं पाई है, उसी चारु के मन की तात्क्षणिक करुणा ही शायद उपेन्द्र को उस बच्ची को “सुजाता” कहकर पुकारने को प्रेरित करती है। खोजे जाने पर जब सुजाता के माता-पिता की बिरादरी वाला कोई व्यक्ति मिल जाता है तब भी उसका आचार-व्यवहार देखकर चारु उसे बच्ची सौंपने से इनकार कर देती है। चार दिन के लिए घर में लाई गयी वह छोटी बच्ची अब उन्हीं दम्पती के घर पलती है। रमा उन्हें माँ-पिताजी कहती है जबकि सुजाता अम्मी और बापू कहकर संबोधित करती है। यह अन्तर सदा बना रहता है। चार साल की हो चुकी सुजाता को अलग करने का प्रयास अब भी होता है लेकिन जब मास्टर जी छोटी सुजाता को बहलाकर अनाथाश्रम ले जाने के लिए आते हैं तब चारु अपने अन्दर उसके प्रति पनप चुके मोह का संवरण नहीं कर पाती और एक आखिरी बार उसे देखने के लिए खिड़की खोल लेती है। मास्टर जी द्वारा करवाया गया वह प्रयास असफल रह जाता है।

दो समवयस्क बालिकाओं की सहज बालसुलभ चञ्चलता एक साथ किशोरावस्था पार।कर यौवन की दहलीज़ पर क़दम रखती है। इस पूरी अवधि में सुजाता के साथ घर में कोई छुआछूत तो नहीं होती लेकिन अगर उसे कभी कोई चारु और उपेन्द्र की बेटी समझ ले तो उसे बताया जाता है कि उनकी बेटी तो रमा है मगर सुजाता भी उनकी “बेटी जैसी” ही है। यह बात बार-बार होती है और हर बार ही सुजाता के मन को सालती है। रमा सुजाता के साथ स्नेहपूर्वक रहती है और उसे दीदी कहकर पुकारती है। रमा कुछ शोख़ है और सुजाता गम्भीर लगती है।

उपेन्द्रनाथ की मुँहबोली बुआजी गिरिबाला के चरित्र को ललिता पवार ने बड़ी खूबी से परदे पर उतारा है। बुआजी छुआछूत में विश्वास रखती हैं। उनके आने पर चारु पहली बार सुजाता को चाय लाने से मना करती है तो उसे यह बात खटकती है। बाद में पूछने पर चारु उसे उसकी “जात” के बारे में बता देती है। बुआजी अपने इकलौते नाती अधीर का विवाह रमा से करना चाहती हैं। चारु भी ऐसा ही चाहती है। उस ज़माने के अनुसार उन दोनों को करीब लाने के लिए जो-जो किया जा सकता था, वे सब उपक्रम चारु और बुआजी भी करती हैं। लेकिन अधीर को सुजाता के मन का ठहराव और व्यक्तित्व की सरलता आकर्षित कर लेती है। अधीर एक नए दौर का पढ़ा-लिखा जागरूक लड़का है और सामाजिक रुढियों और कुप्रथाओं को न मानने वालों में से है। वह सुजाता के सामने अपने मन में उसके प्रति उपजे प्रेम को प्रकट कर देता है। पहली बार अधीर के द्वारा स्पर्श किये जाने पर सुजाता के अन्दर उपजे संकोच को बड़ी खूबसूरती के साथ छुईमुई की पत्तियों के सिकुड़ने के माध्यम से दर्शाया गया है। सुजाता के मन में भी अब प्रेम की तरंगें हिलोरें लेती हैं और आकाश में छाई काली घटाओं को देख गा उठती हैं।

विषय की संजीदगी दिखाते हुए नबेन्दु घोष के द्वारा बड़ी ही माकूल और मार्मिक पटकथा बन पड़ी है जिसकी बानगी कुछ दृश्यों में ख़ास तौर पर देखी जाती है। एक, रमा के जन्मदिन का उत्सव जब सुजाता बाहर अँधेरे में बैठी होती है और अधीर उसके पास आता है और उसे “उपेन्द्र बाबू की ही बेटी” तस्लीम करता है। दो, चाण्डालिका नाटक के बहाने इसी देश के अतीत से महात्मा बुद्ध के शिष्य आनन्द के जीवन की एक घटना का दृष्टान्त लेना और उसे समसामयिक होकर आधुनिक भारत के महात्मा गाँधी के द्वारा अहमदाबाद आश्रम में एक अछूत लड़की लक्ष्मी को रखे जाने की क्रान्तिकारी घटना से इस तरह जोड़ना कि सुजाता उन दोनों में ख़ुद को देख पाए और अपने आपको एक बेहतर नज़र से देखे। तीन, अधीर का अपनी नानी के साथ तथ्यपूर्ण बहस में नानी को निरुत्तर कर देना। चार, बुआजी का चारु और उपेन्द्र के पास जाकर उस बहस में हुई अधीर के तर्कों की जीत को स्वीकार करना और दर्शकों को परोक्षतः यह सन्देश देना कि बरसों से समाज में जमी रूढ़ियों को संस्कारों का नाम देकर बचा नहीं जा सकता। पाँच, सुजाता का अधीर को शादी के लिए इनकार करना और उपेन्द्र द्वारा यह सूचना चारु को देना। महेन्द्र पाल के सरल, सुन्दर और सहज संवाद चित्रपट को दर्शक के मानस तल पर स्थापित कर पाने में पूर्ण समर्थ सिद्ध होते हैं।

नायिका प्रधान इस फिल्म की नायिका सुजाता को नूतन का भंगिमापूर्ण जीवन्त अभिनय वाकई एक “सुजाता” के रूप में दर्शक के मन में प्रतिष्ठित करता है। सुनील दत्त ने इस फिल्म के नायक अधीर के चरित्र के लिए आवश्यक ठहराव का हर संवाद में बखूबी निर्वाह किया है। शशिकला, सुलोचना और तरुण बोस भी क्रमशः रमा, चारु और उपेन्द्रनाथ के किरदारों को भरपूर जीते हुए नज़र आते हैं।

“नन्ही कली सोने चली।।।”, “काली घटा छाए, मोरा जिया तरसाए।।।”, “जलते हैं जिसके लिए मेरी आँखों के दीये।।।” और “तुम जियो हज़ारों साल, साल के दिन हों पचास हज़ार।।।”जैसे जिन सदाबहार गीतों को हम बचपन से सुनते-गुनगुनाते बड़े हुए हैं, उन्हें आशा भोंसले, गीता दत्त, तलत महमूद, एस। डी। बर्मन और मुहम्मद रफ़ी जैसे गायकों ने अपनी दिलकश आवाज़ से सजाया है।

मूलतः अस्पृश्यता जैसी सामाजिक बुराई को केन्द्र में रखकर बुनी गयी यह कहानी समाज के अनेक अन्य आयामों को भी छूती है। जब रमा को पढ़ाने मास्टर जी पहली बार आते हैं तब सुजाता भी पढ़ने को मचलती है मगर उसे किताबें नहीं मिलतीं। ऐसे में जो किताब ज़िद में आकर सुजाता उठा लाती है, वह अपनी जिल्द के अनुसार देखने में शायद कोई धार्मिक पुस्तक मालूम होती है। अखबार में पढ़कर सुजाता के लिए रिश्ता लाने वाले व्यक्ति के किरदार के माध्यम से अस्पृश्यता के साथ-साथ दहेज़-प्रथा के मुद्दे को भी छुआ गया है। प्रतीकात्मकता के सहारे कई गहरी और अनछुई बातों को सशक्त तरीके से छू जाना बिमल राय के सुन्दर और सफल निर्देशन की मिसाल है। समाज को एक दिशा देती इस सार्थक फिल्म को मिले चार फिल्मफेयर पुरस्कार मानो अनेकानेक सुजाताओं के जीवन में चार चाँद लगाते हुए उनके सम्मानपूर्ण अस्तित्व को सामाजिक स्वीकृति मिलने के लिए उठती आवाजों को और बुलन्द करते हैं, और १९६० के कान फिल्म महोत्सव में इस फिल्म का नामित होना इस बात की गवाही देता है।

जिस वर्तमान में हम साँसें ले रहे हैं, उसमें हमें अस्पृश्यता अपने उस लगभग आधी सदी पुराने कठोर, निष्ठुर और नृशंस रूप में तो नहीं दिखाई देती किन्तु हमें जानना और समझना चाहिए कि इतने समय में गंगा में जो पानी बहा है उसमें तमाम कठिनताओं और ज्यादतियों से लड़कर जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अपने बूते आगे आने वालों और तमाम विरोधों के बावजूद डटकर अपने समाज और देश को प्रथम मानकर चलने वाले निस्स्वार्थ और परिश्रमी सुधारकों के रक्त, अश्रु और स्वेद के सम्मिश्रण की मात्रा भी बहुत रही है। आज भी हम सुनते-पढ़ते रहते हैं कि जाति के कारण किसी दूल्हे को शादी में घुड़चढ़ी की रस्म नहीं करने दी गयी, किसी को किसी देवालय में जाने से रोका गया, किसी को सार्वजनिक नल से पानी भरने पर पीट दिया गया आदि। रूढ़ियाँ हमारे ज़हन-ओ-दिल में बड़ी गहरी पैठी हुई हैं। इतनी गहरी कि सुजाता जैसी फ़िल्में आज तक प्रासंगिक हैं। यद्यपि भारतीय संविधान अस्पृश्यता को दण्डनीय अपराध घोषित करता है तथापि शहरी कच्ची बस्तियों, झुग्गियों, कस्बों, गाँव-ढाणियों में आज भी घोषित-अघोषित रूप में यह कुरीति मौजूद है। सामाजिक प्रक्षालन एक सतत किन्तु धीमी प्रक्रिया है। बदलाव आते-आते आ रहा है और हम इस परिवर्तन के साक्षी भी हैं। सुजाता जैसी फ़िल्में जादू-सा करती हैं। इनकी उपयोगिता को हमें, जहाँ भी सम्भव हो, भुनाना चाहिए। यह हमारा सामूहिक उत्तरदायित्व तो है ही, इस फिल्म से जुड़े हर व्यक्ति के कर्तृत्व की सार्थकता भी है। नयी पीढ़ी के मन में एकता और मानवीयता के सुन्दर संस्कार जमाने में ऐसे ६० बरस बूढ़े मन्त्रों की भी महती भूमिका है। इति।

Aryaman Chetas Pandey
Aryaman Chetas Pandey

Latest posts by Aryaman Chetas Pandey (see all)

Comments