लता मंगेशकर के दिलचस्प किस्से

लता और सचिन देव बर्मन :

१९५७ तक लता मंगेशकर पार्श्व गायन सचिन देव बर्मन संगीत निर्देशक के रूप में अपना सिक्का जमा चुके थे और दोनों ने सज़ा ,टैक्सी ड्राइवर ,देवदास जैसी फिल्मों में एक साथ काम करते हुए गजब के गीतों का सृजन किया था। लेकिन १९५७ में फिल्म पेइंग गेस्ट के गानेचाँद फिर निकलाके बाद लगभग पांच साल तक एक साथ काम नहीं किया। बात क्या हुई किसी को उस समय पता नहीं चला। दरअसल यह केवल अहम् का टकराव था। काफी बाद में लता मंगेशकर ने एक इंटरव्यू में कहा की सचिन दा  ने किसी से यह कि कह  दिया की लता  को लता किसने बनाया। इससे लता के स्वाभिमान को ठेस पहुंची और दोनों में बात चीत ही बंद हो गयी. वर्षों तक यह सिलसिला चला और इस दौरान सचिन दा ने लता के बगैर बेहतरीन संगीत का सृजन किया तो लता ने सचिन दा के बगैर ही नयी उचाईयों को प्राप्त किया।अंततः सचिन दा के बेटे पंचम की मध्यथता से यह डेडलॉक टूटा और फिल्म बंदिनी के गीतमोरा गोरा रंग लई लेके साथ ही इस संगीतमय सफर की दुबारा शुरुआत हुई।



लता और मुहम्मद रफ़ी :

यह दरअसल ६० के दशक के शुरआती सालों की बात है। लता मंगेशकर चाहती थी की गाने के मेहनताने के साथ साथ गानों  की बिक्री से प्राप्त आय से उनको रॉयल्टी भी मिले। उन्होंने यह बात रफ़ी साहब से कही क्योंकि वह जानती थी की रफ़ी साहेब सबसे बड़े पुरुष पार्श्व गायक हैं और अगर वो उनका साथ देते हैं तो निर्माताओं को झुकना पड़  जाएगा।लेकिन रफ़ी साहेब सामान्यता एक भद्र पुरुष माने जाते थे उन्होनें इस बात को मानने से इनकार कर दिया। उनका मन्ना था की जब हमको एक बार हमारे गाने का पारिश्रमिक मिल गया तो फिर रॉयल्टी  का कोई औचित्य नहीं है क्योंकि पारिश्रमिक तो हमें मिलता ही है चाहे गाने भले ही लोकप्रिय हो पाएं। इस बात पर दोनों में तकरार हो गयी और दोनों ने एक साथ नहीं गाने का फैसला ले लिया। यह सिलसिला भी लगभग पांच सालों तक चला। इस दौरान दोनों ही एक ही फिल्म में अलग अलग सोलो गीत गाते रहे लेकिन डुएट साथ नहीं गाये। लाता मंगेशकर ने युगल गीत जहाँ मुकेश महेंद्र कपूर किशोर कुमार के साथ गाये तो रफ़ी ने युगल गीत सुमन कल्याणपुर आशा भोसले शारदा के साथ गाये। यह पहला टकराव था जिससे लता को वास्तविक नुक्सान हुआ क्योंकि ज़्यादातर संगीत कार युगल गीतों में पुरुष आवाज़ रफ़ी साहेब की ही रखना चाहते थे इससे आशा भोसले सुमन कल्याणपुर को काफी फायदा मिला और शारदा जैसी नयी पार्श्व गायिका का उदय  हुआ. अंततः संगीतकार जय किशन की मध्यस्थता से तह झगड़ा सुलझा। काफी बाद में रफ़ी साहेब की मृत्यु के  बाद लता मंगेशकर ने एक इंटरव्यू में कहा की जय किशन के कहने पर रफ़ी साहेब ने उन्हें लिखित में एक माफ़ी नामा भेजा था जिससे सुलह हुई।  इस इंटरव्यू के बाद रफ़ी साहेब के पुत्र शाहिद ने यह आरोप लगाया की लता जी रफ़ी साहेब की मृत्यु के बाद झूठ बोल रही हैं।  रफ़ी साहेब ने ऐसा कोई माफीनामा नहीं भेज। और अगर भेज है तो उसे सार्वजनिक किया जाए।



ए मेरे वतन के लोगो

दरअसल चीन युद्ध के बाद २६ जनवरी को दिल्ली में होने वाले गणतंत्र दिवस के कार्यक्रमों में फिल्म जगत चार संगीतकारों नौशाद ,शंकर जय किशन ,मदन मोहन व सी रामचन्द्र को आमंत्रित किया गया थे की वे नेशनल  स्टेडियम में पंडित जवाहरलाल नेहरू के समक्ष देश भक्ति पूर्ण गीतों का गायन करें। इनमे से नौशाद ,शंकर जय किशन व मदन मोहन के पास उनकी फिल्मों से पूर्व में ही सृजित देश भक्ति’पूर्ण गीत थे किन्तु सी रामचंद्र के पास ऐसा कोई गीत नहीं था। इसलिए उन्होंने कवि  प्रदीप से आग्रह किया और इस तरह ऐ मेरे वतन के लोगो का सृजन हुआ। चूँकि उस समय सी राम चंद्र व लता मंगेशकर में किसी बात को लेकर अनबन चल रही थी तो सी रामचंद्र ने आशा भोसले से संपर्क कर उनको इस बात के लिए तैयार किया और गीत की रेहर्सल  भी शुरू हो गयी। लेकिन कवी प्रदीप को लगा की केवल लाता ही इस गीत के साथ न्याय कर सकती हैं। उन्होंने लता मंगेशकर से प्रथक से संपर्क किया व अंततः उन्हें इसके लिए मना  लिया। जब उन्होंने ये बात सी रामचंद्र को बताई तो वे असमंजस में पड़ गए। खैर काफी जद्दोजहद के बात यह तय हुआ की लता व आशा दोनों ही इस गीत पर दिल्ली में परफॉर्म करेंगी और तदनुसार रेहर्सल शुरू हो गयी। लेकिन जैसे ही यह तिथि निकट आने लगी लता मंगेशकर ने कहा की सिर्फ वे ही दिल्ली जाकर परफॉर्म करने वाली हैं आशा दिल्ली नहीं जा रही है। जब सी राम चंद्र ने आशा भोसले से संपर्क किया तो उन्होंने कहा की दीदी उन्हें दिल्ली नहीं जाने देना चाहती। ऐन वक़्त पर आशा भोसले ने इस कार्यक्रम से नाम वापस ले लिया और केवल लता मंगेशकर ने दिल्ली में परफॉर्म किया। आगे का इतिहास सबको पता है लेकिन परदे के पीछे क्या हुआ यह अब भी एक रहस्य है।

नई उभरती हुई महिला पार्श्व गायिकाओं के सम्बन्ध में लता मंगेशकर के रवैये पर हमेशा प्रश्न चिन्ह रहा है। यहाँ तक की छोटी बहिन आशा भोसले ने भी एक इंटरव्यू के दौरान यह कह डाला की यदि लता दीदी ने उनकी थोड़ी बहुत मदद की होती तो उन्हें अपना मुकाम हासिल करने के लिए इतना संघर्ष नहीं करना पड़ता। ऐ मेरे वतन के लोगो से सम्बंधित घटना इस तथ्य को थोड़ा बहुत तथ्यपरक बनाती है। इसके अलावा भी अन्य पार्श्व गायिकाओं जैसे सुमनकल्याणपुर,शारदा  वाणी जयराम, हेमलता ,सुलक्षणा पंडित ,रूना  लैला आदि भी लता मंगेशकर के इस रवैये की कभी न कभी शिकार हुई हैं। और उनके विभिन्न साक्षात्कारों में उनकी यह पीड़ा कहीं न कहीं परिलक्षित हुई है। लेकिन 1970 में लता जी ने स्वयं दुसरो को आगे बढ़ने के लिए खुद फ़िल्मफ़ेअर अवार्ड लेने से मन कर दिया था और उनका आखिरी फ़िल्मफ़ेअर  फिल्म दो रास्ते के गीत बिंदिया चमकेगी से मिला था हालाँकि यह तो नहीं कहा जा सकता की ये सभी गायक लता मंगेशकर के समान प्रतिभावान थे लेकिन लाता मंगेशकर रुपी वटवृक्ष के नीचे  इन नयी प्रतिभाओं को फूलने फलने के पर्याप्त अवसर नहीं मिले इसमें किसी को कोई शंका नहीं हो सकती।

लता  और शंकर

इसके अतिरिक्त जिन संगीतकारों ने नयी पार्श्व गायिकाओं को अवसर देने की कोशिश की उनके साथ भी लता मंगेशकर का रवैया तिरिस्कारपूर्ण रहा। ६० के दशक के उत्तराद्ध में संगीतकार शंकर जय किशन की जोड़ी में कुछ दरार पैदा हुई क्योंकि लाता मंगेशकर के रवैये से परेशान होक संगीतकार शंकर ने नयी पार्श्व गायिका शारदा को बढ़ावा देना प्रारम्भ किया और कई फिल्मों जैसे सूरज ,अराउंड दी  वर्ल्ड ,गुनाहों का देवता आदि में लता की जगह शारदा से पार्श्व गायन करवाया। इससे चिढ़कर लाता मंगेशकर ने शंकर जय किशन के संगीत निर्देशन में गाना बंद कर दिया। इसी कारण से मेरा नाम जोकर जैसी महत्वाकांक्षी फिल्म में भी लता मंगेशकर का कोई गीत नहीं था। इसी बीच जय किशन जी का अवसान हो गया। शारदा इतने बैकअप के बाद भी कोई स्थायी प्रभाव उत्पन्न नहीं कर पायीं और शंकर जय किशन के संगीत का जादू भी काम होने लगा। अंततः मोहम्मद रफ़ी की मध्यस्थता से यह अवरोध दूर हुआ और दोनों ने फिर से फिल्म सन्यासी में एक साथ काम किया और इसका संगीत पुनः लोकप्रिय हुआ।



Prakash Khare

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Retired Government Officer, Big Time Indian Cinema Fan, Old Film Encyclopedia
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