#34 #Scriptors100BestFilms

हर अच्छी फिल्म, निर्देशक की आत्मा का एक हिस्सा होती है. महान फिल्मकार वसंतकुमार शिवशंकर पादुकोण यानी ‘गुरुदत्त’ की आत्मा का एक हिस्सा कही जाने वाली एक ऐसी ही कहानी है ‘कागज़ के फूल’. भारत की सबसे उम्दा फिल्मो में गिनी जाने वाली ये फिल्म उनकी अंतिम निर्देशित फिल्म थी. इस फिल्म की असफलता के बाद गुरुदत्त ने निर्देशन से सदा के लिए संन्यास ले लिया.

ये कहानी है, एक फिल्म निर्देशक सुरेश सिन्हा (गुरुदत्त) की, जिसका संसार ताश के पत्तों से बने महल की तरह ढह चुका है. टूटी हुई शादी से आहात सुरेश की मुलाक़ात अनायास शान्ति (वहीदा रहमान) से होती है, दोनों में प्यार होता है और शान्ति में सुरेश को अपनी फिल्म देवदास की पारो मिल जाती है. जल्द ही उनका प्यार ज़माने भर में दोनों की बदनामी का कारण बनने लगता है. परिस्थितियाँ ऐसी बनती हैं की शान्ति, सुरेश के भले के लिए और उसे उसकी बेटी पम्मी (बेबी नाज़) से मिलवाने के लिए, अपना निखरता हुआ फ़िल्मी ओहदा छोड़ कर चली जाती है. किस्मत दोनों को फिर मिलाती है, पर अब तक सुरेश का पतन हो चुका होता है. शांति फ़िल्मी दुनिया में वापस आकर, सुरेश की मदद करना चाहती है, पर सुरेश का अहम् प्रेम को दया समझ ये बर्दाश्त नहीं कर पाता, और अपने ही स्टूडियो में अपनी की निर्देशक की कुर्सी पर अकेला दुनिया छोड़ देता है.

‘अ स्टार इज बोर्न’ हो या ‘आशिकी-२’, इस कहानी से मिलती जुलती कहानियां हर दशक में, हर देश की सिनेमा में बनाई गई हैं, पर ‘कागज़ के फूल’ में ऐसी कई बातें हैं जो इसे एक बेहतरीन फिल्म बनाती हैं. जहां अधिकतर फिल्मों में मुख्य किरदार अति-मानवीय (सुपर हयूमन) बनाए जाते रहे हैं, इस फिल्म में वे सभी साधारण और मानवी हैं. उनमें हम सब की तरह अहंकार, आक्रोश, प्रेम जैसे सभी भाव हैं. वे हमारे आपके तरह ही बर्ताव करते हैं, इसीलिए शायद इस फिल्म में दिखाए गए हर किरदार से हम खुद को जुड़ा हुआ सा महसूस करते हैं.

फिल्म के कुछ हिस्से बहुत प्रभावित करते हैं जैसे-

  • तलाक की आग में जल रहे शादीशुदा सुरेश का शान्ति की तरफ आकर्षित होना, और समाज की परवाह किये बिना उसे अपनाने की चाह रखना बड़ा ही संभाव्य (बिलिवेबल) है.
  • पम्मी की शान्ति से मुलाक़ात और उसका शान्ति को समझाना कि शान्ति उसके के पिता के जीवन से चले जाने से उसके पिता और उसकी माँ के बीच की दूरियाँ कम हो सकती हैं, एक टूटे हुए परिवार के बच्चे की मनोस्थिति की बखूबी बयान करते हैं.
  • शान्ति का पम्मी के लिए, अपने प्रेम को कुर्बान कर देना, और फिर सुरेश से पम्मी के छीन जाने पर प्रेम के लिए वापस सुरेश के लिए क्रूर फ़िल्मी दुनिया से संघर्ष  करना एक भव्य एवं अप्रतिम प्रेमकहानी है.

ये फिल्म हर लिहाज़ से अति उत्कृष्ट कृति है.

व्ही के मूर्ति के द्वारा किया फिल्म का छायांकन अंतर्राष्ट्रीय स्तर का है, रौशनी और छाया के इस्तेमाल से कहानी को एक अनूठी छवि मिलती है. गीत ‘वक़्त ने किया क्या हसीं सितम’ का फिल्मांकन बेहद सुन्दर और भावपूर्ण तरीके से किया गया है.मुरलीधर रामचंद्र अचरेकर द्वारा किया गया कला निर्देशन बेहद उम्दा है.व्ही के मूर्ति और मुरलीधर रामचंद्र अचरेकर को इस फिल्म के लिए फिल्मफेयर अवार्ड से सम्मानित भी किया गया.फिल्म का संगीत दिया है सचिन देव बर्मन ने. कैफ़ी आज़मी द्वारा रचे गए इस फिल्म के गीत हमारे ज़हन में दशकों से रहे हैं और आगे भी रहेंगे.

फिल्म छिछली और क्रूर फ़िल्मी दुनिया पर एक गहरा कटाक्ष करती है, जो कई स्तरों पर आज भी उसी तरह प्रासंगिक है. सुरेश के किरदार और गुरुदत्त के जीवन में काफी चीज़ें एक सी थी. गुरुदत्त की मौत भी उनके द्वारा निभाये गए सुरेश के किरदार की तरह भी अफसाना बन गई. अपनी पत्नी के अलगाव, बेटी के विछोह, प्रेम से विहीन जीवन और बिखरते हुए फ़िल्मी फ़िल्मी पेशे से जूझते हुए एक कलाकार की कहानी शायद उनके दोस्त अबरार अल्वी ने उनके बारे में सोच कर ही लिखी थी. ये फिल्म ही गुरुदत्त के जीवन का सच बन गई.कहते हैं कि ‘ जिस रात के काले अंधेरों के आगोश में गुरुदत्त मौत की नींद सो गए थे उस रात उन्होंने शराब पी थी, इतनी उन्होंने पहले कभी नहीं पी थी. गीता (उनकी पत्‍‌नी, जिनके साथ वह उनके अलगाव का दौर था) के साथ उनकी नोंकझोंक हो गई थी. गीता ने उनकी बिटिया को उनके साथ कुछ वक्त बिताने के लिए भेजने से इंकार कर दिया था. गुरुदत्त अपनी पत्नी को बार–बार फोन कर रहे थे कि वह उन्हें अपनी बेटी से मिलने दे लेकिन गीता फोन नहीं उठा रही थी. हर फोन के साथ गुरुदत्त का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था. अंत में उन्होंने अल्टीमेटम….या फिर कहें कि यह संकेत देते हुए कहा, “बच्ची को भेज दो या फिर तुम मेरा मरा मुंह देखो.” इसके बाद वो ऐसे सोए कि दुबारा नहीं उठे, अपने निभाये हुए किरदार सुरेश की तरह.

Yohaann Bhaargava
Follow me:

Yohaann Bhaargava

Head - Business Development at SCRIPTORS
Movie Buff. Yohaann is a film critic with Jagran Prakashan Limited. He has been associated with Print and TV media as a branding professional. Presently he is a screenwriter trying to bring in some good scripts up for Bollywood. At Scriptors he works as a writer and handles business development.
Yohaann Bhaargava
Follow me:

Latest posts by Yohaann Bhaargava (see all)