थोड़ा सा बादल… थोड़ा सा पानी…

१९८३ में प्रदर्शित “मासूम” एक बहुत साधारण लेकिन सशक्त कथानक लिए हुए आती है। शेखर कपूर के सफल निर्देशन का नमूना यह फिल्म एक चार-सदस्यीय आम शहरी परिवार की कहानी है। इन्दु और डीके मल्होत्रा अपनी दो बेटियों रिंकी और मिन्नी के साथ रहते हैं। सामाजिक और आर्थिक तौर पर एक खुशहाल परिवार है जो आराम से अपनी ज़िन्दगी जी रहा है। रोज़मर्रा के हँसी-खेल और नोंक-झोंक से भरे माहौल को दिखाते हुए फिल्म में एक गम्भीर मोड़ आता है जब नैनीताल से डीके के नाम एक तार मिलता है जिसमे उसके बेटे बारे में सूचना होती है, ऐसा बेटा जिसके होने के बारे में तब तक उसे ख़ुद भी पता नहीं होता है। कहानी थोड़ा फ्लैशबैक में जाती है। अपनी बड़ी बेटी रिंकी के जन्म के समय से कुछ पहले डीके का नैनीताल जाना होता है जहाँ उसका परिचय भावना से होता है। क्षणिक आवेग में दोनों बह जाते हैं। डीके अपने घर लौट जाता है। समय के साथ भावना एक बेटे को जन्म देती है और डीके के वैवाहिक एवं पारिवारिक जीवन का ख़याल करते हुए उसे इस बारे में कुछ नहीं बताती है। वर्तमान आते नौ साल बीत जाते हैं। भावना की मृत्यु और बेटे को लिवा ले जाने की बात से डीके ख़ुद अचंभित रह जाता है। अन्ततः वह नैनीताल जाने का निश्चय करता है। अपने पिता की राह देखते नौ साल के मासूम राहुल को वह अपने साथ ले तो जाता है लेकिन उसे उसके पिता के बारे में कुछ नहीं बताता है। इन्दु राहुल की मौजूदगी को बर्दाश्त नहीं कर पाती है। राहुल को नैनीताल के एक बोर्डिंग स्कूल में रखा जाना तय होता है जहाँ वह बिलकुल नहीं जाना चाहता। अब तक रिंकी और मिन्नी भी राहुल के साथ बहुत घुल-मिल चुकी होती हैं। संयोग से राहुल को सच्चाई का पता लग जाता है और वह बिना कुछ कहे एक रात घर से चला जाता है। इन्दु और डीके बेहद परेशान हो जाते हैं। पुलिस थाने में रपट भी लिखवाई जाई है। तब तक रात की गश्त कर रहा एक पुलिसवाला राहुल को घर छोड़ जाता है। आखिरकार राहुल को नैनीताल के लिए रवाना करने का समय आता है। डीके रेलवे स्टेशन छोड़ने जाता है। पानी की बोतल कार में छूट जाती है जिसे लेने डीके वापस आता है। पानी पहुँचाने तक ट्रेन जा चुकी होती है। भारी कदमों से कार तक वापस पहुँचते ही वह देखता है कि इन्दु तीनों बच्चों को साथ लिए पहले ही अन्दर बैठी है।




यह फिल्म भारतीय समाज के एकाधिक पहलुओं और मानवीय संवेदनाओं के अनेक आयामों को छूते हुए बढ़ती है। कुछ दृश्य ऐसे बन पड़े हैं कि न चाहते हुए भी आँखें ख़ुद-ब-ख़ुद नाम हुए जाती हैं। इन्दु के मन में बार-बार उपजता मातृत्व और उसका हर बार इस भाव को कभी बलात् तो कभी नारी मन की एक सहज और प्रासंगिक आकुलता के कारण रोक ले जाने का हर दृश्य इस बात की गवाही देता मालूम होता है। शबाना आज़मी की अदाकारी इन्दु के सोने जैसे किरदार पर मानो सुहागे जैसी चढ़ी है। डीके के नपे-तुले और हल्के नटखट अंदाज़ को नसीरुद्दीन शाह ने बख़ूबी निभाया है। उम्मीद, असहजता और अनजान-सी घुटन के एक अजीब मिश्रण से मन ही मन सवाल-जवाब में लगातार व्यस्त राहुल के साथ एकान्त के दृश्यों में जो असमंजस डीके की आँखों से बोलता है, उसे दर्शक नज़रंदाज़ नहीं कर सकता। तीनों बच्चों का निष्कलुष भोलापन पूरी फिल्म के दौरान ही छलकता और साथ ही यह भी दिखता है कि बच्चे किस तरह से संवेदनाओं के प्रति परिपक्व होते हैं। छोटी मिन्नी का राहुल से एकदम जुड़ाव हो जाना और हमउम्र रिंकी और राहुल का बिना कुछ बोले ही बातों की गम्भीरता को समझ लेना इस तथ्य को सुन्दर दृष्टान्त देते हैं। राहुल से विदा लेने के बाद इन्दु और दोनों बेटियों के बीच जो संवाद राहुल के बनाये चित्रों के माध्यम से होता है, वह बहुत हृदयस्पर्शी है, एक छोटे बच्चे  की अभिव्यक्ति के सम्प्रेषण का सुन्दर मनोवैज्ञानिक निरूपण है। तीनों बाल-चरित्रों को जुगल हंसराज, उर्मिला मातोंडकर और आराधना श्रीवास्तव से बेहद ईमानदारी और परिपक्वता के साथ पर्दे पर उतरा है।




हालाँकि एक अनब्याही माँ के जीवन की विडम्बनाओं को कुछ और गहरे जाकर टटोले जा सकने की गुंजाइश लगती है, फिर भी कथावस्तु के एक नौ वर्षीय अबोध बच्चे पर केन्द्रित होने के कारण इसे टाला जा सकता है। आप कह सकते हैं कि यह फ़िल्म भी अन्ततः स्त्री को ही पुरुष के हर कृत्य के परिणाम को स्वीकार करने को बाध्य होना सिखाती है। लेकिन, दरअसल यह फिल्म अपने नेपथ्य में समाज के इसी कुचरित्र को सफलतापूर्वक उजागर करती है। और, जब इसे बार-बार भावुक होते हुए देखने के बाद भी एक दर्शक के तौर पर आप अपने आपको इसी प्रश्न से दो-चार होता पाते हैं तो फिल्म अपने उद्देश्य को प्राप्त होती है। रत्ना और चन्दा के छोटे मगर अहम् किरदार आपको आहिस्ता-आहिस्ता इसी का सामना करने के लिए तैयार करते हैं।




१९८४ में कुल ५ फिल्मफेयर पुरस्कारों से अपना दामन सजाने वाली इस फिल्म की पटकथा लिखने वाले गुलज़ार ने ही इसके गीत भी लिखे हैं जिन्हें राहुल देव बर्मन से अपनी धुनों से कर्णप्रिय बना दिया है। इन सदाबहार गीतों को आरती मुखर्जी, भूपिन्दर सिंह, सुरेश वाडकर, अनूप घोषाल और लता मंगेशकर के स्वरों ने अमर कर दिया है। आप बिलकुल मान सकते हैं कि तीन बाल गायिकाओं वनिता मिश्रा, गौरी बापत और गुरप्रीत कौर के गाए  गीत “लकड़ी की काठी..” में आज भी बच्चों का बचपन झूमता-हुलसता है, बड़े होने की तरफ कदम बढ़ाता है। “तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी…” के बोल आपको कहीं दूर ही लिए जाते हैं। अगर नहीं देखी है तो एक बार ज़रूर देखिये “दो नैना, और एक कहानी…”

Aryaman Chetas Pandey
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